• नेपाल में क्यों बार-बार फे़ल हो रहा है हिंदू कार्ड?

    15 जुलाई 2022 को प्रचंड तीन दिवसीय दौरे पर दिल्ली प्रस्थान कर रहे थे

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    - पुष्परंजन

    ओली पहले कम्युनिस्ट प्रधानमंत्री थे, जो पशुपतिनाथ दर्शन को गये, और 25 लाख डॉलर मंदिर फंड में दान कर आये। ओली खिलंदड़ नेता हैं। गठबंधन सरकार का न्यूनतम साझा कार्यक्रम ओली के नेतृत्व में तैयार हो रहा है। ढाई साल की प्रथम पाली वाली सरकार 'प्रचंड पथ' पर नहीं, 'ओली पथ' पर चलेगी!

    15 जुलाई 2022 को प्रचंड तीन दिवसीय दौरे पर दिल्ली प्रस्थान कर रहे थे। काठमांडो के त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पत्रकारों ने पूछा, 'किस-किस से मिलने का कार्यक्रम है?' प्रचंड ने बताया बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा के न्योते पर जा रहा हूं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, और प्रधानमंत्री मोदी से मिलना है। मगर अफ सोस, पीएम मोदी प्रचंड से मिले नहीं। काठमांडो वापिस उतरे तो उसी एयरपोर्ट पर पत्रकारों ने प्रचंड से पूछा, मोदी आपसे मिले क्यों नहीं? खिसियाये से प्रचंड ने कहा, 'मालूम नहीं', और आगे बढ़ गये। छह महीने बाद कालचक्र का बदलना देखिये, प्रचंड राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी को सरकार बनाने की दावेदारी वाला पत्र देकर फ ारिग़ हुए, सबसे पहला फ ोन दिल्ली से प्रधानमंत्री मोदी ने किया, और उन्हें बधाई दी।

    1 नवंबर 2022 को नेपाल के राष्ट्रीय अख़बारों में गाड़ी हस्तांतरण समारोह की एक ख़बर प्रकाशित हुई। भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव 200 गाड़ियां उपहार स्वरूप वित्त मंत्री जर्नादन शर्मा को प्रदान कर रहे थे, ताकि आम चुनाव सुचारू रूप से संपन्न हो। इस इवेंट को लेकर सवाल उठा कि गाड़ियां कायदे से निर्वाचन आयोग को देनी चाहिए थी। आप देउबा-दाहाल सरकार को गाड़ियां गिफ्ट कर क्या कूटनीतिक लक्ष्य साधना चाहते हैं? जिन्हें इस सवाल का जवाब देना था, वो चुप रहे। मगर, गाड़ियों के मुफ्त पाने की ख़बर पढ़ने पर पता चला कि नेपाल को कुल मिलाकर इस वर्ष 2400 छोटी-बड़ी गाड़ियां हासिल हुई हैं। 14-15 लाख को 2400 से गुणा कर लीजिए, इन गाड़ियों की क़ीमत साढ़े तीन अरब छू जाती है। एक कहावत है, 'घर में नहीं है दाने, अम्मा चली भुनाने।'

    ख़ैर, जब चुनाव परिणाम आने लगे थे, भारतीय राजदूत प्रधानमंत्री निवास बालुआटार दो बार पहुंचे थे। प्रचंड जिस तरह जुलाई में दिल्ली आये थे, पीएम मोदी उनसे मिल लिये होते, तो शायद कनेक्टिविटी को फि र से ताज़ा करने और दोनों पक्षों को समझाने में भारतीय कूटनीति को सफ लता मिलती। चीनी रणनीतिकारों ने इस बार पूरी सावधानी बरती थी। भारतीय दूतावास की तरह चुनावी इवेंट, और मेल मुलाकात को उजागर नहीं होने दिया। विगत शनिवार को नेपाली मीडिया में हल्ला मचा कि काठमांडो स्थित चीनी चार्ज द अफेयर्स वांग शिन की प्रचंड, केपी शर्मा ओली और जनता समाजवादी पार्टी के नेता उपेन्द्र यादव से मुलाक़ात हुई थी। इस ख़बर के मीडिया में आने के अगले दिन रविवार को चीनी दूतावास के सेकेंड सेक्रेट्री, झांग शी ने इसका खंडन किया कि वांग शिन किसी भी नेपाली नेता से नहीं मिले थे। यह तो मानना पड़ेगा कि चीनियों ने इस बार जो कुछ खेल किया, चुपचाप किया।

    प्रचंड, या फि र ओली पेइचिंग के सबसे भरासेमंद हैं, उसका परीक्षण 2008 में हो चुका था। प्रचंड 2008 में पहली बार प्रधानमंत्री बने थे, उस कालखंड में सबसे अधिक कहर बरपा तिब्बती शरणार्थियों पर। अध्यादेश जारी हुआ कि नेपाल अधिराज्य में तिब्बती किसी कि़स्म का प्रदर्शन नहीं करेंगे। उस साल 500 से अधिक तिब्बती नेपाल भर में गिरफ्तार किये गये थे। नेपाल मेें 20 हज़ार के आसपास तिब्बती शरणार्थी रहते हैं। प्रचंड के बाद जो भी प्रधानमंत्री हुए, किसी ने भी तिब्बतियों के प्रति नरमी नहीं बरती।

    नेपाल में तिब्बती बौद्धों के मानवाधिकार बाधित करने की हर कोशिशें विगत 14 वर्षों में हुई हैं। इनकी नाकेबंदी की छोटी सी मिसाल है 1984 में श्रीलंका में आहूत वर्ल्ड बुद्धिस्ट फ्रेंडशिप कांफ्रें स, जहां प्रस्ताव दिया गया कि एक चीनी बौद्ध मंदिर नेपाल में निर्मित होना चाहिए। इसके प्रकारांतर 1986 में 'वर्ल्ड फेलोशिप ऑफ बुुद्धिस्ट कांफ्रेस' काठमांडो में हुआ, जिसमें 10वें पणछेन लामा ने इस प्रस्ताव का अनुमोदन किया कि लुम्बिनी में चोंगहुआ टेंपल बने। 10वें पणछेन लामा उन दिनों चीनी पीपुल्स पार्टी स्टैंंडिग कमेटी के वाइस चेयरमैन थे, और बुद्धिस्ट एसोसिएशन ऑफ चाइना के मानद अध्यक्ष भी। झाओ पुछू तब बुद्धिस्ट एसोसिएशन ऑफ चाइना के पूर्णकालिक अध्यक्ष थे, उन्होंने लुम्बिनी में चोंगहुआ टेंपल (चीनी मठ) बनाने के प्रस्ताव को तत्कालीन नेपाल नरेश से स्वीकृत करा लिया था।

    अप्रैल 1996 में जब शेर बहादुर देउबा चीन की राजकीय यात्रा पर गये, लुंबिनी में मंदिर वाले मुद्दे पर तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री ली फंग की तरफ़ से दबाव बनाया गया। देउबा नेपाल लौटे और 1 दिसंबर 1996 को लुंबिनी में चोंगहुआ टेंपल की तामीर रख दी गई। 33 मिलीयन यूआन का चीनी मंदिर बनने में कुछ महीने लगे। तत्कालीन चीनी राजदूत झांग चिउ हुआन ने इस मठ के निर्माण में सबसे अधिक समय दिया। बुद्ध की जन्मस्थली लुंबिनी एक ऐसे सामरिक लोकेशन पर है, जहां से नेपाल के पश्चिमी हिस्से में चीनी गतिविधियों को चलाना आसान हो गया। इस इलाक़े से दलाईलामा के समर्थक धीरे-धीरे हाशिये पर चले गये।

    यह दिलचस्प है कि नेपाल में चीनियों की संख्या भारत के मुक़ाबले नगण्य है। इस हिमाल देश में न तो उनका भारत जैसा बेटी-रोटी का संबंध है, न ही धार्मिक रूप से चीनी बौद्धों ने अपने अनुयायियों की फ ौज बना ली। मगर, उन्होंने नेपाल जैसे बफ र स्टेट को इस तरी$के से साधा, ताकि सीमा पार तिब्बत में उसकी तपिश न पहुंचे। यों, कांग्रेस के समय भी धर्म की कूटनीति करने की कोशिशें हुईं, मगर 1988 में तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी की नेपाल यात्रा के दौरान सोनिया गांधी के पशुपतिनाथ मंदिर में प्रवेश निषेध वाले मुद्दे ने अरसे तक नेपाल से अनबन का माहौल बनाये रखा।

    भारत पिछले आठ वर्षों से इस इलाक़े में धर्म की कूटनीति करने के प्रयास में लगातार रहा है। नेपाल में राजाशाही जब तक रही, राष्ट्रवाद का अफ ीम पब्लिक को पिलाती रही। चुनांचे, जब 2014 में भारत में बीजेपी की सरकार बनी, सत्ता से दूर नेपाल नरेश को लगा कि नेपाल एकबार फि र हिंदू राष्ट्र बनेगा, और राजतंत्र की वापसी होगी। योगी आदित्यनाथ तब सांसद थे, जब उनकी गतिविधियां विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष अशोक सिंघल के साथ नेपाल में तेज़ हुईं। 2016 में योगी नेपाल के चौतारा में अशोक सिंघल के साथ मंच पर थे, वहां दोनों महानुभावों ने पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र की उपस्थिति में नेपाल को दोबारा से हिंदू राष्ट्र घोषित करवाने का संकल्प किया था। 2015 में नेपाल को जब सेक्यूलर स्टेट घोषित करने की संविधानिक कवायद चल रही थी, योगी आदित्यनाथ ने वहां के पीएम को बाकायदा पत्र लिखा था, कि नेपाल को हिंदू राष्ट्र घोषित न करना अनुचित है।

    2014 से मई 2022 के बीच प्रधानमंत्री मोदी पांच बार नेपाल की यात्राकर चुके हैं। 2014 में पीएम मोदी दो बार नेपाल गये, तब तक भारतीय विदेश नीति पर धार्मिक रंग पूर्ण रूप से नहीं चढ़ा था। मगर, दिल्ली दरबार के रणनीतिकारों को लगा कि नेपाल में हिंदू राजनीति की संभावनाओं को देखते हुए कूटनीति में धर्म का तड़का आवश्यक है। मई और अगस्त 2018 में प्रधानमंत्री मोदी ने इसी लक्ष्य को साधने के वास्ते जनकपुर धाम और पशुपतिनाथ से मुक्तिनाथ की यात्राएं कीं। 16 मई 2022 को बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर पीएम मोदी लुंबिनी पधारे। प्रश्न यह है कि पीएम मोदी क्या इन धार्मिक यात्राओं से चीन को परास्त कर पाये?

    नेपाल की 81.3 प्रतिशत हिंदू आबादी हिंदूवाद के नाम पर आंदोलित क्यों नहीं होती? इसके सामाजिक-आर्थिक और जनसांख्यिकी मिजाज़ पर दिल्ली से नागपुर तक सक्रिय ंिहंदू रणनीतिकारों को मंथन करना चाहिए। मोदी जब-जब नेपाल की यात्रा पर गये, उस देश में हिंदू संगठनों की संख्या बढ़ती चली गई। विश्व हिंदू महासंघ, विश्व हिंदू परिषद, हिंदू स्वयंसेवक संघ, सनातन धर्म सेवा, ओंकार समाज, नेपाल राष्ट्रवाद समाज जैसे सौ के आसपास संगठनों को नेपाल में सक्रिय किया गया। इन्हें खर्चा-पानी के लिए पैसा भारत से आता रहा, इसपर किसी को शंका नहीं होना चाहिए।

    एक और दिलचस्प परिवर्तन नेपाली कांग्रेस में देखने को मिला। नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता देवेन्द्र लाल नेपाली बरसों से राजतंत्र की वापसी की पैरोकारी विभिन्न फ ोरम पर करते रहे। 2018 में नेपाली कांग्रेस के एक और नेता शंकर भंडारी ने हिंदू राष्ट्र की पुनर्वापसी का महाअभियान छेड़ा, जिसमें नेपाली कांग्रेस महासमिति के 1400 सदस्यों में से 734 ने हस्ताक्षर किये थे। यानी, शेरबहादुर देउबा भी हिंदू कार्ड भीतर ही भीतर खेल रहे थे। नेपाली सेना के प्रमुख रहे जनरल रूकमांगद कटवाल ने हिंदू राष्ट्र स्वाभिमान जागरण अभियान जैसे मंच का गठन अगस्त 2021 में किया। उससे दो सप्ताह पहले नेपाल के देवघाट में 20 हिंदू संगठनों ने साझा मंच बनाया, ताकि आम चुनाव में राजा और राष्ट्रवाद समर्थक लोग सत्ता में आयें। यह सब फु स्स हो गया।

    राजा महेंद्र के ज़माने में नेपाल के पर्वतीय इलाक़ों में राष्ट्रवाद के चोबदार ब्राह्मण और छेत्री ही रहे हैं। इन जातियों के क्षत्रपों का नारा था-'एक राजा-एक देश, एक भाषा-एक भेष'। वामपंथी जब आये राष्ट्रवाद की परिभाषा बदल दी। 'भारत का विरोध और चीन का समर्थन' प्रतिक्रियावादियों ने नेपाली राष्ट्रवाद का नैरेटिव ही बदल दिया। नेपाल का सोशल डायनेमिक्स 2006 में जनांदोलन-टू और 2007 से 2008 के बीच मधेस आंदोलन के समय बदल चुका था। वंचित समाज के लोग राष्ट्रीय राजनीति में आये, मगर सत्ता में उनकी भागीदारी से धार्मिक भावनाएं राजनीतिक इंधन के रूप में परिवर्तित नहीं हो पा रही थीं।

    घनघोर कम्युनिस्ट केपी शर्मा ओली ने तो हिंदू धर्म को अपनी राजनीति का हथियार बना डाला। ओली ने प्रधानमंत्री रहते ढूंढ निकाला कि भगवान राम चितवन में अवस्थित माडी पालिका में जन्मे थे। घोषणा की, कि हम मंदिर वहीं बनाएंगे। ओली धार्मिक अफ ीम का इतना बड़ा गोला खा लेंगे, यह मोदी ने भी नहीं सोचा था। ओली पहले कम्युनिस्ट प्रधानमंत्री थे, जो पशुपतिनाथ दर्शन को गये, और 25 लाख डॉलर मंदिर फं ड में दान कर आये। ओली खिलंदड़ नेता हैं। गठबंधन सरकार का न्यूनतम साझा कार्यक्रम ओली के नेतृत्व में तैयार हो रहा है। ढाई साल की प्रथम पाली वाली सरकार 'प्रचंड पथ' पर नहीं, 'ओली पथ' पर चलेगी!
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